आखिरी पडाव का सफ़र, माथे पर झुरमुठ की छावं |
सहलाते बैठकर यहाँ, थके हुए पीठ और पाँव |
मिलते ही मीत हो गए, अनजाने हमउम्र लोग,
अद्भुत अपनापन का भाव, साले मन किंचित वियोग |
अपने मेहमान बन गए, औपचारिक सेवा सद्भाव |
विरल श्वेत बादलो के बीच, झाँक रहा धूसर मयंक |
पंछी सब एक डाल के, ना कोई राजा ना रंक |
कलरव में निर्गुण की धुन, सरगम में कम्पन ठहराव |
चिबुक संग नासिका मिली, दसन गए खुला छोड़ द्वार |
जिह्वा निर्बाध दौड़ती, चौकठ ना कोई दीवार |
शब्द उलझ कंठ में फंसे, मन में कुछ कहने की चाव |
बचपन की यादों के पल, जोड़ते हैं बात की कड़ी |
हंस लेते बैठ कर यहाँ, हृदय खोल रोज दो घडी |
बतरस के भिन्न भिन्न रंग, अनुभव में किंचित टकराव |
जटिल कई प्रशन अनछुए ,सहज लगे बाँट परस्पर |
चेहरे की गहरी शिकन, पल भर को जाती पसर |
चलते ही साथ हो लिए, चिंता तनहाई तनाव |
यन्त्रवत प्रचंड वेग से सडकों पर भागती सी भीड़ |
दाने तलाशने उड़े विहग बृंद छोड़-छोड़ नीड़ |
अपने दिन याद आ रहे, आया अब कितना बदलाव |
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-रघुनाथ प्रसाद
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Thursday, September 23, 2010
Friday, July 23, 2010
uplabdhiyan :ak prashn
धरती सागर नभमंडल क्या
हम पहुंचे चाँद-सितारों तक
हम छान चुके निर्झर नदियाँ
जंगल हिमशिखर पहाड़ों तक .
अवनी ताल की गहराई से
खनिजों को खोद निकाला है
फिर जाँच-परख ,संशोधित कर
इच्छित सांचों में ढाला है .
सदियों पहले ,सागर तल की
गहराई तक हम झांक चुके
रत्नाकर के तहखाने में
क्या-क्या संचित हम आँक चुके .
क्या जीव-जंतु क्या वनस्पति
संरचना सब की जान गए .
हर तंतु-तंतु की जटिल क्रिया
जांची विधिवत ,पहचान गए .
शीशे की नलिकाओं में हम
मानव का बीज उगा सकते
पौधों की कलम कवन पूछे
हम अपनी कलम उगा सकते .
हम वायु वेग से सफ़र करें
बिजली से बातें करते हैं
पल भर में विश्व मिटाने की
क्षमता का भी दम भरते हैं .
वैचित्र्य प्रकृति का अनावृत
करके देखा परखा जाना
पर हे मानव तूने अब तक
क्या स्वयं स्वयं को पहचाना ?
रघुनाथ प्रसाद
हम पहुंचे चाँद-सितारों तक
हम छान चुके निर्झर नदियाँ
जंगल हिमशिखर पहाड़ों तक .
अवनी ताल की गहराई से
खनिजों को खोद निकाला है
फिर जाँच-परख ,संशोधित कर
इच्छित सांचों में ढाला है .
सदियों पहले ,सागर तल की
गहराई तक हम झांक चुके
रत्नाकर के तहखाने में
क्या-क्या संचित हम आँक चुके .
क्या जीव-जंतु क्या वनस्पति
संरचना सब की जान गए .
हर तंतु-तंतु की जटिल क्रिया
जांची विधिवत ,पहचान गए .
शीशे की नलिकाओं में हम
मानव का बीज उगा सकते
पौधों की कलम कवन पूछे
हम अपनी कलम उगा सकते .
हम वायु वेग से सफ़र करें
बिजली से बातें करते हैं
पल भर में विश्व मिटाने की
क्षमता का भी दम भरते हैं .
वैचित्र्य प्रकृति का अनावृत
करके देखा परखा जाना
पर हे मानव तूने अब तक
क्या स्वयं स्वयं को पहचाना ?
रघुनाथ प्रसाद
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