Saturday, November 7, 2009

"यादों के झरोखें से"

सूनी शाम सुराही खाली, भूली बिसरी यादें, हम ।
कागज़ शेष सियाही सूखी, चलते-चलते थकी कलम ।
फिसलन भरी अँधेरी राहें, गलियारों में खोई सी,
लंबा सफर दूर है मंजिल, औ सांसो की गिनती कम ।
देख रहा अंदाज़ नया अब, भौवरों के मंडराने का ।
कागज़ के फूलों पर ज्यादा, बागों की कलिओं पर कम ।
चकाचौंध में खोते देखा, नित गुमराह जवानी को,
आँख मूँद कर दौड़ लगाते, कल क्या होगा किसको गम ।
कंक्रीट के जंगल उगते, मूक जीव बेघर बदहाल,
मानवता को रफ्ता-रफ्ता, निगल रहा नित स्वार्थ अहम् ।
पीर पिरो कुछ गीत बुने, 'गुमनाम' कभी चलते चलते,
किसे पड़ी जो सुनकर करता, नाहक अपनी आँखें नम ।
-रघुनाथ प्रसाद ।

Wednesday, September 30, 2009

"पेट अपना कुँआ हो गया"

यह शहर आलिशां हो गया ।
जर्फिदा अब जवां हो गया ।

रिश्ते-रिश्ते पे कीमत की पर्ची,
आदमी बस दुकां हो गया ।

चहचहाते नहीं अब परिन्दे,
यूँ कफस आशियां हो गया ।

ख़ुद परस्ती का अब तो ये आलम,
आदमी बदजुबां हो गया ।

ख़ुद-नुमायी के दौरे चलन में,
आइना बदगुमां हो गया ।

कौन पोंछे गरीबों के आंसू,
पेट अपना कुँआ हो गया ।

बिक रहा अब तो पानी हवा भी,
लो अधतिया फलां हो गया ।

तल्ख़ ज़ज़्बा दफ़न था ज़हन में,
रफ्ता-रफ्ता बयाँ हो गया ।

कल जो 'गुमनाम' लूटा चमन को,
अब वही बागवां हो गया ।

-रघुनाथ प्रसाद



"तुम वफ़ा के नाम पर"

तुम वफ़ा के नाम पर, कोरी कसम खाते रहे ।
हम हकीकत की गली में, ठोकरें पाते रहे ।

बद से बदतर दिन-ब-दिन, होता रहा हाले मरीज़,
आप बस झोला लिए, आते रहे जाते रहे ।

तान सीना कह गए, घर-घर जलाएँगे चराग
और खुद ही रोशनी से, आप घबराते रहे ।

ढल चुकी है रात कलि, छंट रही अब तीरगी,
कुत्ब को तारा सुबह का, आप बतलाते रहे ।

फेंक नीचे हड्डियाँ, खाते रहे शाही कवाब,
लड़ रहे कुत्ते गली के, आप मुस्काते रहे ।

चोट उतनी ही सही, जो काबिले बर्दाश्त हो,
अब नहीं मुमकिन न चीखें, ज़ख्म सहलाते रहे ।

सड़ चुके उस घाव पर, पट्टी चढ़ाना था फिजूल,
नश्तरे जर्राह से 'गुमनाम' कतराते रहे ।

-रघुनाथ प्रसाद

Wednesday, September 16, 2009

संकल्प

बहुत लंबे अंतराल तक सभी सुभेच्छु बंधुओं के साथ जुड़ने से वंचित रहने का कारन अस्वस्थता एवं आलस्य मात्र रहा । आगे जब तक शरीर साथ देगा, आप सभी बंधुओं से जुड़े रहने का प्रयास करता रहूँगा क्योंकि अपना तो संकल्प है.......
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झिलमिलाये दीप, लौ की रोशनी कामने न पाए ।
चल रही है साँस जब तक, साधना थमने न पाए ।

मानता यह कार्य दुष्कर, यातनाओं से भरा है ।
क्रांति पथ का सजग प्रहरी, कंटकों से कब डरा है ?
विष्व में समभाव की परिकल्पना न डगमगाए । चल रही.....

है देख अत्याचार को, मुहँ फेर लेना तो सरल ।
हां, भूल निज अधिकार को, चुपचाप पी ले क्यों गरल ।
लेखनी निष्पक्ष निर्भय, चेतना मरने न पाए । चल रही.....

मेघ से ढक जाये नभ, कड़के हज़ारों बिजलियाँ ।
कठिन झंझावात, मुसलाधार बरसें बदलियाँ ।
हृदय में जो दीप जलता, आस का, बुझने न पाए । चल रही.....

वंचना उपलब्धि की छलती रही, छलती रहेगी ।
सोचना क्यों, स्वार्थ में अन्धी दुनियाँ क्या कहेगी ।
कर्म से बस नेह, फल की कामना छलने न पाए । चल रही.....

कह सकें निर्बन्ध जो, कहती है कानों में हवायें,
या भटकते धुन्ध में, सहमे परिन्दों की सदायें,
धार हो अभिव्यक्ति में, संवेदना कामने न पाए । चल रही.....

-रघुनाथ प्रसाद

Tuesday, July 21, 2009

पाल ये बदल डालो

कई सुराख़ नज़र आ रहे सफीने में ।
ख्वाब साहिल का मगर पाल रहे सीने में।

तिरी नज़र को यार लग गई नज़र किसकी,
लगी तलाशने दानिस्तगी कमीने में।

चलो उतर के जरा हाथ पाँव तो मारें,
कोई मानी नहीं दहशत की साँस जीने में।

कौन कहता है बेबसी है, बेसहारे हैं,
अभी दमख़म है बहुत खून में, पसीने में।

जरूरी तो नहीं हम भी उसी राह चलें,
बानाएं रास्ता मौजों के तल्ख़ सीने में।

कुतुबनुमा न सही कुत्ब रहनुमा होगा,
जुनूननो जज्बा अगर आदमी के सीने में।

हो गए तार तार पाल ये बदल डालो,
वक्त जाया न करो, बार बार सीने में।

चलो माना की यूँ 'गुमनाम' हीं फना होंगे,
नहीं पैमाना गिनो यार कभी पीने में।

- रघुनाथ प्रसाद

Saturday, July 4, 2009

कलयुग


हे मुरलीधर, मोर मुकुटधर,
गोवर्धन, गिरिधारी ।
केशव, माधव, पार्थसार्थी,
नटवर, कुंज बिहारी ।

कुटिल कंस, शकुनी, दुःशासन,
नगर-नगर पर हावी ।
अंधे राजा के हाथों में,
पड़ी कोष की चाबी ।

धर्मराज तरसे रोटी को,
भीम करें दरवानी ।
स्वस्ति गान सहदेव कर रहें,
नकुल परोसें पानी ।

बृहन्नला बन अर्जुन नाचें,
बजा-बजा कर ताली ।
चीर हरण का दंश झेलतीं,
गली-गली पांचाली ।

माखन चोर बता दो इतना,
क्या पाया उत्कोच ।
आँखें बन्द सुदर्शन कुंठित,
बदल गई है सोच ।

- रघुनाथ प्रसाद

अंधेरा क्यों?

दरवाजे पर धूप खड़ी, अंदर घनघोर अंधेरा क्यों?
चौकठ पर बर्छी भाला ले पहरेदार लुटेरा क्यों?

कंधे बैठा बाज व्याध के पिंजरा कम्पा हाथ लिए,
तनी गुलेल पेड़ की टहनी चक्रव्यूह का घेरा क्यों?

घने धुन्ध में ढ़ूँढ़ रहीं हैं डैना ताने ललमुनियाँ।
कहाँ हमारा रैन बसेरा, उत्तर ने मुँह फेरा क्यों?

मेघ भटकते दिशाहीन, धरती प्यासी, अंकुर सूखें।
झंझावात तड़ित डाले, पर्वत के ऊपर डेरा क्यों?

यक्ष प्रश्न बन खड़ा, सही उत्तर कोई दे पाएगा?
पोषण का प्रहरी बन जाता, शोषक का मौसेरा क्यों?