Tuesday, June 29, 2010

गीत गाता हूँ चमन के पंछियों से सुर मिला के

पीर रिसती हृदय के हर तंतु से तब तिलमिला के .
गीत गाता हूँ चमन के पंछियों से सुर मिला के .

तार वीणा के खिंचे तब मीड का विस्तार होता ,
तार पर मिजराब के आघात से झंकार होता ,
थाप खा मिरदंग बजता ,ताल में सुर लय मिला के .
गीत गाता हूँ चमन के पंछियों से सुर मिला के

बांसुरी के हृदय में इतने अगर ना छेद होते ,
टेर में संगीत मधुरिम किस तरह वादक पिरोते .
बांस नलिका साज बनती ,तप्त छड से तन जला के .
गीत गाता हूँ चमन के पंछियों से सुर मिला के .

पीर अपनी या पराई ,या विरह की वेदनाएं ,
या विषम परिवेश की ,संचित गहन संवेदनाएं .
युग समय का गीत गढ़ती अश्रु से दीपक जला के .
गीत गाता हूँ चमन के पंछियों से सुर मिला के .

               - रघुनाथ प्रसाद

3 comments:

  1. achchhi prastuti ........shabda sanyojan bahut achchha

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  2. बांसुरी के हृदय में इतने अगर ना छेद होते ,
    टेर में संगीत मधुरिम किस तरह वादक पिरोते .

    bahut hee badhiya prastutee, jeevan mei aaye dukho ka yathharthh...

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  3. बहुत सुन्दर!

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